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आखिर चीन क्या चाहता है?

 दुनिया के दो बड़े देशों के आमने आकर शक्ति परिक्षण की स्थिति पैदा होने से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर चीन चाहता क्या है? इससे  पहले हम ताईवान को लेकर दोनों देशों के मध्य तना-तनी की स्थिति को अच्छी तरह से देख ही चुके हैं उस समय भी एकबार ऐसा लगा कि अब दोनों देशों के मध्य युद्ध हो कर रहेगा लेकिन कुछ ही दिनों में बौखलाहट की स्थिति मद्धिम पड़ती चली गई, अब चीन फिर से एक बार भारतीय LAC पर अपनी गति विधियों को तेज कर दिया।     जैसा कि पहले से हम देखते सुनते रहे हैं कि चीन अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण बार-बार भारतीय सीमा से घुसपैठ कर भारतीय भू भाग पर कब्जा करना चाहता है दरअसल  उसके इस विस्तारवादी सोच के पीछे कहीं न कहीं चीनी आबादी ही जिम्मेदार है लेकिन वह केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के अन्य देशों जैसे रूस, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार, इंडोनेशिया, फिलीपींस, जापान, मंगोलिया, उत्तर कोरिया, वियतनाम जैसे कई देशों के साथ इसी तरह की हरक़त करने में लगा  रहाता है दरअसल चीनी सीमा in देशों के सीमाओं से सटे होने के कारण वह उनके भू भाग पर भी कब्जा करने क...

कब सुधरेगी यह अवस्था

कब सुधरेगी यह अवस्था आज देश में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों की ख़बरें अक्सर सुनाई देती रहतीं है लेकिन जब भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों पर नकेल डालने के मद्देनजर कार्यवाही करने के उद्देश्य से उनपर छापे मारी की कार्यवाही होती है तो राजनीतिक लोग हो-हल्ला मचाते हुये यह कहना शुरू कर देते हैं कि यह करवाई राजनीति से प्रेरित हैं ऐसे में स्वाभाविक है कि एक तरफ जहां एजेंसियां डाल-डाल हैं तो दुसरी तरफ भ्रष्टाचारी तत्व पात-पात, जैसे  मुहावरे को चरितार्थ करते दिखते हैं वैसे सही बात कहा जाये तो हमारे देश में भ्रष्टाचार के आरोप से घिरे नेताओं एवं नौकरशाहों जैसे लोगों को यदि जल्द से जल्द कठोर से कठोर सजा मिलने की राह आसान हो जाए तो निश्चित तौर पर कोई भी भ्रष्टाचार करने की जुर्रत नहीं करेगा, लेकिन होता यह है कि भ्रष्टाचारियों से लेकर अपराधियों पर दोष सिद्ध होने में इतना लम्बा समय निकल जाता है कि सजा का महत्व और प्रभाव दोनो क्षीण हो जाते है और ऐसे में मामला इतना कमजोर हो जाता है कि वह स्वतः खत्म हो जाता है या अपराधी येन-केन प्रकारेण अपने आप को साफ बचाने में कामयाब हो जाते है। 

वर्ष 24 और मोदी

 वर्ष 20 24 के चुनावो की तैयारियों के मद्देनजर भारतीय राजनीति में अब बीना विपक्षीयों के एक साथ आये आगामी चुनाव में जीत की बात तो छोड दीजिये मोदी को चुनौती देना भी असंभव लगता है, क्यूंकि भारतीय राजनीति में अब तक हुये चुनावों और उसमें जीती हुई पार्टियों के लिये मुद्दा एक अहम भूमिका अदा करता चला आ रहा है, देश की जनता को आकर्षित करने वाले एजेंडे के बिना किसी भी पार्टी के चुनावों में सफल होना संदिग्ध हो जाता है लेकिन अब वर्ष 2024 में होने वाले चुनाव में राष्ट्रीय स्तर का कोई मुद्दा ढूंढना इतना आसान नहीं रह गया है, क्यूंकि धीरे-धीरे मौजूदा सरकार ने वर्षों से चले आ रहे अनेकों ज्वलन्त मुद्दों को लगभग खत्म कर दिया है। खैर ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष खत्म हो जाए और ऐसा होना भी नहीं चहिए क्यूंकि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का होना बहुत जरूरी है, इसलिए आज  एक बात तो स्पष्ट है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी क्यूँ न हो उसे धरातल पर जनता के लिये काम किये वगैर चुनावों में जीत हासिल करना बहुत मुश्किल है।  जहां तक ज्वलन्त मुद्दे की बात करें तो देश की लगभग सभी पार्टियां एक लम्बे समय तक अय...