वर्ष 24 और मोदी

 वर्ष 20 24 के चुनावो की तैयारियों के मद्देनजर भारतीय राजनीति में अब बीना विपक्षीयों के एक साथ आये आगामी चुनाव में जीत की बात तो छोड दीजिये मोदी को चुनौती देना भी असंभव लगता है, क्यूंकि भारतीय राजनीति में अब तक हुये चुनावों और उसमें जीती हुई पार्टियों के लिये मुद्दा एक अहम भूमिका अदा करता चला आ रहा है, देश की जनता को आकर्षित करने वाले एजेंडे के बिना किसी भी पार्टी के चुनावों में सफल होना संदिग्ध हो जाता है लेकिन अब वर्ष 2024 में होने वाले चुनाव में राष्ट्रीय स्तर का कोई मुद्दा ढूंढना इतना आसान नहीं रह गया है, क्यूंकि धीरे-धीरे मौजूदा सरकार ने वर्षों से चले आ रहे अनेकों ज्वलन्त मुद्दों को लगभग खत्म कर दिया है। खैर ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष खत्म हो जाए और ऐसा होना भी नहीं चहिए क्यूंकि किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष का होना बहुत जरूरी है, इसलिए आज  एक बात तो स्पष्ट है कि कोई भी राजनीतिक पार्टी क्यूँ न हो उसे धरातल पर जनता के लिये काम किये वगैर चुनावों में जीत हासिल करना बहुत मुश्किल है। 


जहां तक ज्वलन्त मुद्दे की बात करें तो देश की लगभग सभी पार्टियां एक लम्बे समय तक अयोध्या राममंदिर के मामले को चुनावी मुद्दा बनाते रहे और इस मामले को हमेशा जिंदा बनाये रखने के लिये शासन सत्ता संभालती रही सरकारों ने भी इसे अपने फायदे के लिये लटकाये रहें, लेकिन अब यह मुद्दा सदैव के लिये खत्म हो गया।


 दरअसल हमारे देश की अधिकतर राजनितिक पार्टियां अब तक देश की भोली-भाली जनता के विश्वास से खेलती आई है और ऐसे में राजनीतिक पार्टियां छल-कपट का सहारा लेकर अब तक चुनावों में सफलता पाते चले आ रहे थे जिसके कारण वे इस तरह से हासिल जीत के अभ्यस्त हो चुके हैं इसलिये वे आज भी वहीं रास्ता ढूंढते नजर आते हैं।


अब यदि हम देश के सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस की बात करें तो इसमें कोई संदेह नहीं कि वह अपना राजनीतिक प्रभाव खो देने के बावजूद भी एक राष्ट्रीय दल जरूर है लेकिन क्या वह विभिन्न क्षेत्रीय दलों को अपने साथ मिलकर भाजपा को चुनौती देने में सक्षम होगी? इसमें संदेह है। दरअसल वास्तविकता यह है कि पार्टी के पास ऐसा कोई भी एजेंडा ही नहीं है जो आम जनता का ध्यान अपनी ओर खिंच सकें।


आज जब हम विपक्षी एकता की बात करते हैं तो उसमे ऐसा लगता है कि क्षेत्रीय दलें कांग्रेस का साथ देने के बदले उसकी बची-खुची राजनीतिक जमीन ही न खा जाये इस बात की बड़ी संभवना है, क्यूंकि ऐसे सभी दलों के मुखियाओं को प्रधानमंत्री बनने की चाहत हैं।


वैसे कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस को  अपने साथ मिला कर भाजपा से मुकाबला करने की भले हिम्मत जुटा रहे हो लेकिन उनमें से कई लोगों को तो उसका नेतृत्व ही  स्वीकार नहीं है बल्कि यदि सही कहा जाये तो इनमें से कुछ लोग तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद के योग्य उम्मीदवार ही नहीं मानते है। ऐसे में कुछ दलों ने कांग्रेस के वैगर ही विपक्षी दलों को एकजुट करने की रणनीति अपनाने में लगे है। इनमें से एक प्रमुख दल के रूप से तृणमूल कांग्रेस हैं।  वैसे यहां आपको बता दें कि कांग्रेस पहले से ही कई राज्यों में अपनी राजनीतिक जमीन खो चुकी है और यदि अब वह विपक्षी एकता के लिये क्षेत्रीय दलों को अपने साथ जोड़ती है तो वह स्वयं एक क्षेत्रीय दल के रूप में सिमट कर रह जाएगी इसमे कोई अतिशयोक्ति नहीं है ऊपर से आज कांग्रेस, देश के अनेक राज्यों में तीसरे-चौथे नम्बर की हैसियत रखने वालीं पार्टी बनकर रह गई है।











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